Posts

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम

सञ्जय उवाच अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।  नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते ॥  हे ब्राह्मण श्रेष्ठ ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिये। आपकी जानकारी के लिये मेरी सेना के जो-जो सेनापति हैं, उनको बतलाता हूँ ॥ १/७ ॥ 

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि

  सञ्जय उवाच अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।  युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥  धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।  पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥  युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।  सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥  इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्य कि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद, धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान् काशिराज, पुरुजित्, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान् उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र - ये सभी महारथी हैं ॥१/४–६॥ 

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्

सञ्जय उवाच  पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।  व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥  हे आचार्य ! आपके बुद्धिमान् शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्य द्वारा व्यूहकार खड़ी की हुई है पाण्डुपुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिये ॥ १/३ ॥ 

दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा

सञ्जय उवाच  दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।  आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥ 1/2 ॥ अन्वय –  सञ्जयः उवाच ( सञ्जयने कहा )  राजा दुर्योधनः तदा ( राजा दुर्योधनने तब )  व्यूढम् ( व्यूह रचनापूर्वक स्थित )  पाण्डवानीकम् ( पाण्डवोंकी सेनाको )  दृष्ट्वा तु ( देखकर और )  आचार्यम् उपसङ्गम्य ( द्रोणाचार्य के पास उपस्थित होकर )  वचनम् ( यह वचन )  अब्रवीत् ( कहा )   अनुवाद – सञ्जय ने कहा - महाराज ! पाण्डवों की सेना को व्यूहाकार में अवस्थित देखकर दुर्योधन ने द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा || २ ||  भावानुवाद - सञ्जय ने धृतराष्ट्र के आन्तरिक भाव को समझकर कहा कि आपके इच्छानुसार युद्ध अवश्य ही होगा । परन्तु इसका परिणाम धृतराष्ट्र के मनोरथ के विपरीत होगा । यह जानकर सञ्जय 'दृष्ट्वा' आदि शब्द कह रहे हैं । यहाँ 'व्यूढं' शब्द का तात्पर्य व्यूहरचनापूर्वक अवस्थित पाण्डवों की सेना से है । अतः राजा दुर्योधन अन्दर से भयभीत होकर 'पश्यैतां' इत्यादि नौ श्लोकों को कह रहे हैं ।। २ ।। ===========

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः

धृतराष्ट्र उवाच  धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।  मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥ 1/1 ॥  अन्वय –  धृतराष्ट्रः उवाच ( धृतराष्ट्रने कहा )  सञ्जय ( हे सञ्जय ! )  धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे ( धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्रमें )  युयुत्सवः ( युद्धके लिए )  समवेताः ( एकत्रित )  मामकाः ( दुर्योधनादि मेरे पुत्रों )  च ( और )  पाण्डवाः ( युधिष्ठिरादि पाण्डुपुत्रोंने )  एव ( तत्पश्चात् )  किम् अकुर्वत ( क्या किया )  अनुवाद - धृतराष्ट्रने कहा - हे सञ्जय ! धर्मभूमिस्वरूप कुरुक्षेत्र में मेरे पुत्रों तथा पाण्डुपुत्रों ने युद्ध की इच्छा से एकत्रित होने के पश्चात् क्या किया ? | ॥१ ॥ ---------------